महाशिवरात्रि

यह पर्व भगवान शिव, जो कि प्रथम आदिगुरु हैं तथा सत्य और परमानंद के जनक हैं, को समर्पित है। यह वही हैं जिनसे ज्ञान की उत्पत्ति हुई। कुछ किंवदंतियों के अनुसार, भगवान शिव को ब्रह्मांड के रचयिता और विध्वंसक के रूप में भी जाना जाता है।

शिवरात्रि वह रात्रि है जिसका शिवतत्त्व से घनिष्ठ संबंध है। भगवान शिव की अतिप्रिय रात्रि को शिव रात्रि कहा जाता है। शिव पुराण के ईशान संहिता में बताया गया है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में आदिदेव भगवान शिव करोडों सूर्यों के समान प्रभाव वाले लिंग रूप में प्रकट हुए-

फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि। 
शिवलिंगतयोद्भूत: कोटिसूर्यसमप्रभ:॥

फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि में चन्द्रमा सूर्य के समीप होता है। अत: इसी समय जीवन रूपी चन्द्रमा का शिवरूपी सूर्य के साथ योग मिलन होता है। अत: इस चतुर्दशी को शिवपूजा करने से जीव को अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। यही शिवरात्रि का महत्त्व है। महाशिवरात्रि का पर्व परमात्मा शिव के दिव्य अवतरण का मंगल सूचक पर्व है। उनके निराकार से साकार रूप में अवतरण की रात्रि ही महाशिवरात्रि कहलाती है। हमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर आदि विकारों से मुक्त करके परमसुख, शान्ति एवं ऐश्वर्य प्रदान करते हैं।

कहते हैं कि महाशिवरात्रि में किसी भी प्रहर अगर भोले बाबा की आराधना की जाए, तो मां पार्वती और भोले त्रिपुरारी दिल खोलकर कर भक्तों की कामनाएं पूरी करते हैं. महाशिवरात्रि पर पूरे मन से कीजिए शिव की आराधना और पूरी कीजिए अपनी हर कामना.

महाशिवरात्रि हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है. यह भगवान शिव के पूजन का सबसे बड़ा पर्व भी है. फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि पर्व मनाया जाता है. माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि को भगवान शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था.

प्रलय की बेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं, इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा गया. विश्वास किया जाता है कि तीनों लोकों की अपार सुंदरी तथा शीलवती गौरी को अर्धांगिनी बनाने वाले शिव प्रेतों और पिशाचों से घिरे रहते हैं. उनका रूप बड़ा अजीब है. शरीर पर मसानों की भस्म, गले में सर्पों का हार, कंठ में विष, जटाओं में जगत-तारिणी पावन गंगा तथा माथे में प्रलयंकार ज्वाला उनकी पहचान है.

बैल को वाहन के रूप में स्वीकार करने वाले शिव अमंगल रूप होने पर भी भक्तों का मंगल करते हैं और श्री-संपत्ति प्रदान करते हैं. यह दिन जीव मात्र के लिए महान उपलब्धि प्राप्त करने का दिन भी है. बताया जाता है कि जो लोग इस दिन परम सिद्धिदायक उस महान स्वरूप की उपासना करता है, वह परम भाग्यशाली होता है.

इसके बारे में संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी ने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के मुख से कहलवाया है-  
‘शिवद्रोही मम दास कहावा. सो नर सपनेहु मोहि नहिं भावा.’ जो शिव का द्रोह करके मुझे प्राप्त करना चाहता है, वह सपने में भी मुझे प्राप्त नहीं कर सकता. इसीलिए श्रावण मास में शिव आराधना के साथ श्रीरामचरितमानस पाठ का बहुत महत्व होता है.

शिव की महत्ता को ‘शिवसागर’ में और ज्यादा विस्तृत रूप में देखा जा सकता है. शिवसागर में बताया गया है कि विविध शक्तियां, विष्णु व ब्रह्मा, जिसके कारण देवी और देवता के रूप में विराजमान हैं, जिसके कारण जगत का अस्तित्व है, जो यंत्र हैं, मंत्र हैं, ऐसे तंत्र के रूप में विराजमान भगवान शिव को नमस्कार है.

दक्षिण भारत का प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘नटराजम्‌’  भगवान शिव के सम्पूर्ण आलोक को प्रस्तुत करता है. इसमें लिखा गया है कि मधुमास यानी चैत्र माह के पूर्व अर्थात् फाल्गुन मास की त्रयोदशी को प्रपूजित भगवान शिव कुछ भी देना शेष नहीं रखते हैं. इसमें बताया गया है कि ‘त्रिपथगामिनी’ गंगा, जिनकी जटा में शरण और विश्राम पाती हैं, त्रिलोक- आकाश, पाताल व मृत्युलोक वासियों के त्रिकाल यानी भूत, भविष्य व वर्तमान को जिनके त्रिनेत्र त्रिगुणात्मक बनाते हैं.


जिनके तीनों नेत्रों से उत्सर्जित होने वाली तीन अग्नि जीव मात्र का शरीर पोषण करती हैं, जिनके त्रैराशिक तत्वों से जगत को त्रिरूप यानी आकार, प्रकार और विकार प्राप्त होता है, जिनका त्रिविग्रह त्रिलोक को त्रिविध रूप से नष्ट करता है, ऐसे त्रिवेद रूपी भगवान शिव मधुमास पूर्वा प्रदोषपरा त्रयोदशी तिथि को प्रसन्न हों.

महाशिवरात्रि

किसी मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी ‘शिवरात्रि’ कही जाती है, किन्तु माघ (फाल्गुन, पूर्णिमान्त) की चतुर्दशी सबसे महत्त्वपूर्ण है और महाशिवरात्रि कहलाती है। *गरुड़पुराण, स्कन्दपुराण, पद्मपुराण, अग्निपुराण आदि पुराणों में उसका वर्णन है। कहीं-कहीं वर्णनों में अन्तर है, किंतु प्रमुख बातें एक सी हैं। सभी में इसकी प्रशंसा की गई है। जब व्यक्ति उस दिन उपवास करके बिल्व पत्तियों से शिव की पूजा करता है और रात्रि भर ‘जारण’ (जागरण) करता है, शिव उसे नरक से बचाते हैं और आनन्द एवं मोक्ष प्रदान करते हैं और व्यक्ति स्वयं शिव हो जाता है। दान, यज्ञ, तप, तीर्थ यात्राएँ, व्रत इसके कोटि अंश के बराबर भी नहीं हैं।

अग्निपुराण, स्कन्दपुराण में कथा

गरुड़पुराण में इसकी गाथा है- आबू पर्वत पर निषादों का राजा सुन्दरसेनक था, जो एक दिन अपने कुत्ते के साथ शिकार खेलने गया। वह कोई पशु मार न सका और भूख-प्यास से व्याकुल वह गहन वन में तालाब के किनारे रात्रि भर जागता रहा। एक बिल्ब (बेल) के पेड़ के नीचे शिवलिंग था, अपने शरीर को आराम देने के लिए उसने अनजाने में शिवलिंग पर गिरी बिल्व पत्तियाँ नीचे उतार लीं। अपने पैरों की धूल को स्वच्छ करने के लिए उसने तालाब से जल लेकर छिड़का और ऐसा करने से जल की बूँदें शिवलिंग पर गिरीं, उसका एक तीर भी उसके हाथ से शिवलिंग पर गिरा और उसे उठाने में उसे शिवलिंग के समक्ष झुकना पड़ा। इस प्रकार उसने अनजाने में ही शिवलिंग को नहलाया, छुआ और उसकी पूजा की और रात्रि भर जागता रहा। दूसरे दिन वह अपने घर लौट आया और पत्नी द्वारा दिया गया भोजन किया। आगे चलकर जब वह मरा और यमदूतों ने उसे पकड़ा तो शिव के सेवकों ने उनसे युद्ध किया उसे उनसे छीन लिया। वह पाप रहित हो गया और कुत्ते के साथ शिव का सेवक बना। इस प्रकार उसने अज्ञान में ही पुण्यफल प्राप्त किया। यदि इस प्रकार कोई भी व्यक्ति ज्ञान में करे तो वह अक्षय पुण्यफल प्राप्त करता है।

गरुड़पुराण में कथा

अग्निपुराण में सुन्दरसेनक बहेलिया का उल्लेख हुआ है। स्कन्दपुराण में जो कथा आयी है, वह लम्बी है- चण्ड नामक एक दुष्ट किरात था। वह जाल में मछलियाँ पकड़ता था और बहुत से पशुओं और पक्षियों को मारता था। उसकी पत्नी भी बड़ी निर्मम थी। इस प्रकार बहुत से वर्ष बीत गए। एक दिन वह पात्र में जल लेकर एक बिल्व पेड़ पर चढ़ गया और एक बनैले शूकर को मारने की इच्छा से रात्रि भर जागता रहा और नीचे बहुत सी पत्तियाँ फेंकता रहा। उसने पात्र के जल से अपना मुख धोया, जिससे नीचे के शिवलिंग पर जल गिर पड़ा। इस प्रकार उसने सभी विधियों से शिव की पूजा की, अर्थात् स्नापन किया (नहलाया), बेल की पत्तियाँ चढ़ायीं, रात्रि भर जागता रहा और उस दिन भूखा ही रहा। वह नीचे उतरा और एक तालाब के पास जाकर मछली पकड़ने लगा। वह उस रात्रि घर नहीं जा सका था, अत: उसकी पत्नी बिना अन्न-जल के पड़ी रही और चिन्ताग्रस्त हो उठी। प्रात:काल वह भोजन लेकर पहुँची, अपने पति को एक नदी के तट पर देख, भोजन को तट पर ही रख कर नदी को पार करने लगी। दोनों ने स्नान किया, किन्तु इसके पूर्व कि किरात भोजन के पास पहुँचे, एक कुत्ते ने भोजन चट कर लिया। पत्नी ने कुत्ते को मारना चाहा किन्तु पति ने ऐसा नहीं करने दिया, क्योंकि अब उसका हृदय पसीज चुका था। तब तक (अमावस्या का) मध्याह्न हो चुका था। शिव के दूत पति-पत्नी को लेने आ गए, क्योंकि किरात ने अनजाने में शिव की पूजा कर ली थी और दोनों ने चतुर्दशी पर उपवास किया था। दोनों शिवलोक को गए।

पद्मपुराण में इसी प्रकार एक निषाद के विषय में उल्लेख हुआ है।

महाशिवरात्रि के बारे में कथाएं

महाशिवरात्रि के त्यौहार से संबधित कई किंवदंतियां हैं। इनमें से एक उत्तर भारत में सबसे प्रमुख शिव और पार्वती का विवाह है। यह माना जाता है कि भगवान शिव और पार्वती का विवाह इसी दिन हुआ था और उनके विवाह की रात्रि को महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। मंदिरों को बहुत खूबसूरती से सजाया जाता है और भगवान को विभिन्न प्रकार की मिठाइयों और खाद्य पदार्थों के चढ़ावे चढ़ाए जाते हैं। अविवाहित लड़कियां भी व्रत रखती हैं और भगवान शिव से आशीर्वाद के रूप में उन्हीं के समान पति पाने के लिए प्रार्थना करती हैं।

एक और लोकप्रिय मान्यता के रूप में “नीलकंठ” की कथा भी महा शिवरात्रि से जुड़ी है। इस कथा के अनुसार, एक बार देवताओं और राक्षसों के बीच एक युद्ध हुआ। वे दोनों अमृत का सेवन करना चाहते थे, लेकिन विष को ग्रहण किए बिना, अमृत को प्राप्त नहीं किया जा सकता था। देवताओं और राक्षसों के बीच युद्ध के कारण हर जगह त्राहि-त्राहि मच गई। इसलिए ब्रह्मांड को विनाश से बचाने के लिए भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। भगवान शिव को उस विष के दुष्प्रभाव से बचाने के लिए, पार्वती और अन्य देवता सारी रात जागते रहे और विष के हानिकारक प्रभावों से बचाने के लिए भगवान शिव को भी रात भर जगाते रहे। पूरी रात किसी ने कुछ भी नहीं खाया – पिया। भगवान शिव बच गए लेकिन उनका कंठ(गला) नीला हो गया। तभी से वह “नीलकंठ” के रूप में माने जाते है और इस रात्रि को ‘महाशिवरात्रि’ के रूप में मनाया जाता है। लोग भगवान शिव के बलिदान के प्रति पूरे दिन उपवास करते हुए प्रेम और भक्ति के साथ स्वादिष्ट व्यंजनों को चढ़ाकर इस रात्रि के अवसर का जश्न मनाते हैं।

किंवदंतियों के अनुसार, भगवान शिव सबसे शक्तिशाली देवता हैं। भगवान शिव में सच्चाई, शांति, भोलेपन और सौंदर्य आदि सभी गुण समाहित हैं।

शिवरात्रि का परम पर्व स्वयं परमात्मा के सृष्टि पर अवतरित होने की याद दिलाता है. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री-पुरुष, बालक, युवा और वृद्ध सभी इस व्रत को कर सकते हैं. इस व्रत के विधान में सवेरे स्नानादि से निवृत्त होकर उपवास रखा जाता है.

शिवरात्रि पर सच्चा उपवास यही है कि हम परमात्मा शिव से बुद्ध‍ि योग लगाकर उनके समीप रहे. उपवास का अर्थ ही है समीप रहना. जागरण का सच्चा अर्थ भी काम, क्रोध आदि पांच विकारों के वशीभूत होकर अज्ञान रूपी कुम्भकरण की निद्रा में सो जाने से स्वयं को सदा बचाए रखना है.

शिवरात्रि के पर्व पर जागरण का विशेष महत्व है. पौराणिक कथा है कि एक बार पार्वतीजी ने भगवान शिवशंकर से पूछा, ‘ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?’  उत्तर में शिवजी ने पार्वती को ‘शिवरात्रि’ के व्रत का उपाय बताया.

चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं. अत: ज्योतिष शास्त्रों में इसे परम शुभफलदायी कहा गया है. वैसे तो शिवरात्रि हर महीने में आती है. परंतु फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि कहा गया है. ज्योतिषीय गणना के अनुसार सूर्य देव भी इस समय तक उत्तरायण में आ चुके होते हैं तथा ऋतु परिवर्तन का यह समय अत्यन्त शुभ कहा गया है. शिव का अर्थ है कल्याण. शिव सबका कल्याण करने वाले हैं. अत: महाशिवरात्रि पर सरल उपाय करने से ही इच्छित सुख की प्राप्ति होती है.

ज्योतिषीय गणित के अनुसार चतुर्दशी तिथि को चंद्रमा अपनी क्षीणस्थ अवस्था में पहुंच जाते हैं, जिस कारण बलहीन चंद्रमा सृष्टि को ऊर्जा देने में असमर्थ हो जाते हैं. चंद्रमा का सीधा संबंध मन से कहा गया है. अब मन कमजोर होने पर भौतिक संताप प्राणी को घेर लेते हैं तथा विषाद की स्थिति उत्पन्न होती है, जिससे कष्टों का सामना करना पड़ता है. चंद्रमा शिव के मस्तक पर सुशोभित है. इसलिए चंद्रदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए भगवान शिव का आश्रय लिया जाता है.


एक कथा यह भी बताती है कि महाशिवरात्रि शिव की प्रिय तिथि है, इसलिए प्राय: ज्योतिषी शिवरात्रि को शिव अराधना कर कष्टों से मुक्ति पाने का सुझाव देते हैं. शिव आदि-अनादि है. सृष्टि के विनाश और पुन:स्थापन के बीच की कड़ी हैं. ज्योतिष में शिव को सुखों का आधार मान कर महाशिवरात्रि पर अनेक प्रकार के अनुष्ठान करने की महत्ता कही गई है.

कैसे करें महाशिवरात्रि में पूजा…

हम आपको बताते हैं कि इस दिन शिव की पूजा किस तरह से की जाती है. सबसे पहले मिट्टी के बर्तन में पानी भरकर, ऊपर से बेलपत्र,  धतूरे के पुष्प, चावल आदि डालकर शिवलिंग पर चढ़ायें. हां एक उपाय और बताता हूं, अगर घर के आस-पास में शिवालय न हो, तो शुद्ध गीली मिट्टी से ही शिवलिंग बनाकर भी उसे पूजा जा सकता है.

माना जाता है कि इस दिन शिवपुराण का पाठ सुनना चाहिए. रात्रि को जागरण कर शिवपुराण का पाठ सुनना हरेक व्रती का धर्म माना गया है. इसके बाद अगले दिन सवेरे जौ, तिल, खीर और बेलपत्र का हवन करके व्रत समाप्त किया जाता है.

माना जाता है कि यह दिन भगवान शंकर का सबसे पवित्र दिन है. यह अपनी आत्मा को पुनीत करने का महाव्रत है. इस व्रत को करने से सब पापों का नाश हो जाता है. हिंसक प्रवृत्ति बदल जाती है. निरीह जीवों के प्रति आपके मन में दया भाव उपजता है. महाशिवरात्रि को दिन-रात पूजा का विधान है. चार पहर दिन में शिवालयों में जाकर शिवलिंग पर जलाभिषेक कर बेलपत्र चढ़ाने से शिव की अनंत कृपा प्राप्त होती है. साथ ही चार पहर रात्रि में वेदमंत्र संहिता, रुद्राष्टा ध्यायी पाठ ब्राह्मणों के मुख से सुनना चाहिए.

सूर्योदय से पहले ही उत्तर-पूर्व में पूजन-आरती की तैयारी कर लेनी चाहिए. सूर्योदय के समय पुष्पांजलि और स्तुति कीर्तन के साथ महाशिव रात्रि का पूजन संपन्न होता है. उसके बाद दिन में ब्रह्मभोज भंडारा के द्वारा प्रसाद वितरण कर व्रत संपन्न होता है.

शास्त्रों के अनुसार, शिव को महादेव इसलिए कहा गया है कि वे देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, किन्नर, गंधर्व पशु-पक्षी व समस्त वनस्पति जगत के भी स्वामी हैं. शिव का एक अर्थ कल्याणकारी भी है. शिव की अराधना से संपूर्ण सृष्टि में अनुशासन, समन्वय और प्रेम भक्ति का संचार होने लगता है. इसीलिए, स्तुति गान कहता है- मैं आपकी अनंत शक्ति को भला क्या समझ सकता हूं. अतः हे शिव, आप जिस रूप में भी हों उसी रूप को मेरा आपको प्रणाम.

शिव और शक्ति का सम्मिलित स्वरूप हमारी संस्कृति के विभिन्न आयामों का प्रदर्शक है. हमारे अधिकांश पर्व शिव-पार्वती को समर्पित हैं. शिव औघड़दानी हैं और दूसरों पर सहज कृपा करना उनका सहज स्वभाव है.

‘शिव’ शब्द का अर्थ है ‘कल्याण करने वाला’. शिव ही शंकर हैं. शिव के ‘शं’ का अर्थ है कल्याण और ‘कर’ का अर्थ है करने वाला. शिव, अद्वैत, कल्याण- ये सारे शब्द एक ही अर्थ के बोधक हैं. शिव ही ब्रह्मा हैं, ब्रह्मा ही शिव हैं. ब्रह्मा जगत के जन्मादि के कारण हैं.

गरुड़, स्कंद, अग्नि, शिव तथा पद्म पुराणों में महाशिवरात्रि का वर्णन मिलता है. यद्यपि सर्वत्र एक ही प्रकार की कथा नहीं है, परंतु सभी कथाओं की रूपरेखा लगभग एक समान है. सभी जगह इस पर्व के महत्व को रेखांकित किया गया है और यह बताया गया है कि इस दिन व्रत-उपवास रखकर बेलपत्र से शिव की पूजा-अर्चना की जानी चाहिए.

व्रत से क्या मिलता है फल…

हर कोई चाहता है कि वह भगवान की आराधना करे, उपवास रखे. साथ ही वह भगवान से अपनों के दुखों को दूर करने का भी वरदान मांगता है और जीवन में तरक्की की कामना करता है. हम आपको बताते हैं कि शिव की उपासना और व्रत रखने से क्या-क्या फल मिलते हैं. माना जाता है कि महाशिवरात्रि के सिद्ध मुहूर्त में शिवलिंग को प्राण प्रतिष्ठित करवाकर स्थापित करने से व्यवसाय में वृद्धि और नौकरी में तरक्की मिलती है.

शिवरात्रि के प्रदोष काल में स्फटिक शिवलिंग को शुद्ध गंगा जल, दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से स्नान करवाकर धूप-दीप जलाकर मंत्र का जाप करने से समस्त बाधाओं का शमन होता है. बीमारी से परेशान होने पर और प्राणों की रक्षा के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें. याद रहे, महामृत्युंजय मंत्र का जाप रुद्राक्ष की माला से ही करें. मंत्र दिखने में जरूर छोटा दिखाई देता है, किन्तु प्रभाव में अत्यंत चमत्कारी है.

शिवरात्रि के दिन एक मुखी रुद्राक्ष को गंगाजल से स्नान करवाकर धूप-दीप दिखा कर तख्ते पर स्वच्छ कपड़ा बिछाकर स्थापित करें. शिव रूप रुद्राक्ष के सामने बैठ कर सवा लाख मंत्र जप का संकल्प लेकर जाप आरंभ करें. जप शिवरात्रि के बाद भी जारी रख सकते हैं. मंत्र इस प्रकार है- ॐ नम: शिवाय.

सृष्टि से तमोगुण तक के संहारक सदाशिव की आराधना से लौकिक और परलौकिक दोनों फलों की उपलब्धता संभव है. तमोगुण की अधिकता दिन की तुलना में रात्रि में अधिक होने से भगवान शिव ने अपने लिंग के प्रादुर्भाव के लिए मध्यरात्रि को स्वीकार किया. यह रात्रि फाल्गुन कृष्ण में उनकी प्रिय तिथि चतुर्दशी में निहित है. वर्ष की तीन प्रमुख रात्रि में शिवरात्रि एक है. इस दिन व्रत करके रात्रि में पांच बार शिवजी के दर्शन-पूजन-वंदन से व्यक्ति अपने समस्त फल को सुगमता से पा सकता है.

इस पर्व का महत्व सभी पुराणों में वर्णित है. इस दिन शिवलिंग पर जल अथवा दूध की धारा लगाने से भगवान की असीम कृपा सहज ही मिलती है. इनकी कृपा से कुछ भी असंभव नहीं है. 


‘जय-जय शंकर, हर-हर शंकर’ का कीर्तन करना चाहिए. इस दिन सामर्थ्य के अनुसार रात्रि जागरण अवश्य करना चाहिए. शिवालय में दर्शन करना चाहिए. कोई विशेष कामना हो तो शिवजी को रात्रि में समान अंतर काल से पांच बार शिवार्चन और अभिषेक करना चाहिए. किसी भी प्रकार की धारा लगाते समय शिवपंचाक्षर मंत्र का जप करना चाहिए.

शिवरात्रि कैसे मनायें

तिथितत्त्व के अनुसार इसमें उपवास प्रमुखता रखता है, उसमें शंकर के कथन को आधार माना गया है- ‘मैं उस तिथि पर न तो स्नान, न वस्त्रों, न धूप, न पूजा, न पुष्पों से उतना प्रसन्न होता हूँ, जितना उपवास से।’ किन्तु हेमाद्रि, माधव आदि ने उपवास, पूजा एवं जागरण तीनों को महत्ता दी है

कालनिर्णय में शिवरात्रि शब्द के विषय में एक लम्बा विवेचन उपस्थित किया गया है। क्या यह ‘रूढ’ है (यथा कोई विशिष्ट तिथि) या यह ‘यौगिक’ है, या ‘लाक्षणिक’ या ‘योगरूढ’ है। निष्कर्ष यह निकाला गया है कि यह शब्द पंकज के सदृश योगरूढ है जो कि पंक से अवश्य निकलता है, किन्तु वह केवल पंकज (कमल) से ही सम्बन्धित है (यहाँ रूढि या परम्परा) न कि मेढक से।

शिवरात्रि नित्य एवं काम्य दोनों है। यह नित्य इसलिए है कि इसके विषय में वचन है कि यदि मनुष्य इसे नहीं करता तो पापी होता है, ‘वह व्यक्ति जो तीनों लोकों के स्वामी रुद्र की पूजा भक्ति से नहीं करता, वह सहस्त्र जन्मों में भ्रमित रहता है।’ ऐसे भी वचन हैं कि यह व्रत प्रति वर्ष किया जाना चाहिए- ‘हे महादेवी, पुरुष या पतिव्रता नारी को प्रतिवर्ष शिवरात्रि पर भक्ति के साथ महादेव की पूजा करनी चाहिए। यह व्रत काम्य भी है, क्योंकि इसके करने से फल भी मिलते हैं।

ईशानसंहिता के मत से यह व्रत सभी प्रकार के मनुष्यों द्वारा सम्पादित हो सकता है- ‘सभी मनुष्यों को, यहाँ तक की चाण्डालों को भी शिवरात्रि पापमुक्त करती है, आनन्द देती है और मुक्ति देती है।’ ईशानसंहिता में व्यवस्था है- ‘यदि विष्णु या शिव या किसी देव का भक्त शिवरात्रि का त्याग करता है तो वह अपनी पूजा (अपने आराध्य देवी की पूजा) के फलों को नष्ट कर देता है। जो इस व्रत को करता है उसे कुछ नियम मानने पड़ते हैं, यथा अहिंसा, सत्य, अक्रोध, ब्रह्मचर्य, दया, क्षमा का पालन करना होता है, उसे शांत मन, क्रोधहीन, तपस्वी, मत्सरहित होना चाहिए; इस व्रत का ज्ञान उसी को दिया जाना चाहिए जो गुरुपादानुरागी हो, यदि इसके अतिरिक्त किसी अन्य को यह दिया जाता है तो (ज्ञानदाता) नरक में पड़ता है।

इस व्रत का उचित काल है रात्रि, क्योंकि रात्रि में भूत, शक्तियाँ, शिव घूमा करते हैं। अत: चतुर्दशी को उनकी पूजा होनी चाहिए।

स्कन्दपुराण में आया है कि कृष्ण पक्ष की उस चतुर्दशी को उपवास करना चाहिए, वह तिथि सर्वोत्तम है और शिव से सायुज्य उत्पन्न करती है। शिवरात्रि के लिए वही तिथि मान्य है जो उस काल से आच्छादित रहती है। उसी दिन व्रत करना चाहिए, जब कि चतुर्दशी अर्धरात्रि के पूर्व एवं उपरान्त भी रहे। हेमाद्रि में आया है कि शिवरात्रि नाम वाली वह चतुर्दशी जो प्रदोष काल में रहती है, व्रत के लिए मान्य होनी चाहिए; उस तिथि पर उपवास करना चाहिए, क्योंकि रात्रि में जागरण करना होता है}।

व्रत के लिए उचित दिन एवं काल के विषय में पर्याप्त विभेद हैं। निर्णयामृत ने ‘प्रदोष’ शब्द पर बल दिया है तथा अन्य ग्रंथों में ‘निशीथ’ एवं अर्धरात्रि पर बल दिया है। यहाँ हम निर्णयकारों के शिरोमणि माधव के निर्णय प्रस्तुत कर रहे हैं। यदि चतुर्दशी प्रदोष-निशीथ व्यापिनी हो तो व्रत उसी दिन करना चाहिए। यदि वह दो दिनों वाली हो अर्थात् वह त्रयोदशी एवं अमावस्या दोनों से व्याप्त हो और वह दोनों दिन निशीथ काल तक रहने वाली हो या दोनों दिनों तक इस प्रकार न उपस्थित रहने वाली हो तो प्रदोष व्याप्त व्यापक निश्चय करने वाली होती है; जब चतुर्दशी दोनों दिनों तक प्रदोषव्यापिनी हो या दोनों दिनों तक उससे निर्मुक्त हो तो निशीथ में रहने वाली ही नियामक होती है; किंतु यदि वह दो दिनों तक रहकर केवल किसी से प्रत्येक दिन (प्रदोष या निशीथ) व्याप्त हो तो जया से संयुक्त अर्थात् त्रयोदशी तिथि नियामक होती है।

प्राचीन कालों में शिवरात्रि के सम्पादन का विवरण गरुड़पुराण में मिलता है- त्रयोदशी को शिव सम्मान करके व्रती को कुछ प्रतिबन्ध मानने चाहिए। उसे घोषित करना चाहिए- ‘हे देव, मैं चतुर्दशी की रात्रि में जागरण करूँगा। मैं यथाशक्ति दान, तप एवं होम करूँगा। हे शम्भु, मैं चतुर्दशी को भोजन नहीं करूँगा, केवल दूसरे दिन खाऊँगा। हे शम्भु, आनन्द एवं मोक्ष की प्राप्ति के लिए आप मेरे आश्रय बनें।’ व्रती को व्रत करके गुरु के पास पहुँचना चाहिए और पंचामृत के साथ पंचगव्य से लिंग को स्नान कराना चाहिए। उसे इस मंत्र का पाठ करना चाहिए- ‘ओम नम: शिवाय’। चन्दन लेप से आरम्भ कर सभी उपचारों के साथ शिव पूजा करनी चाहिए और अग्नि में तिल, चावल एवं घृतयुक्त भात डालना चाहिए। इस होम के उपरान्त पूर्णाहुति करनी चाहिए और (शिव विषयक) सुन्दर कथाएँ एवं गान सुनने चाहिए। व्रती को पुन: अर्धरात्रि, रात्रि के तीसरे पहर एवं चौथे पहर में आहुतियाँ डालनी चाहिए। सूर्योदय के लगभग उसे ‘ओम नम: शिवाय’ का मौन पाठ करते हुए शिव प्रार्थना करनी चाहिए- ‘हे देव, आपके अनुग्रह से मैंने निर्विघ्न पूजा की है, हे लोकेश्वर, हे शिव, मुझे क्षमा करें। इस दिन जो भी पुण्य मैंने प्राप्त किया और मेरे द्वारा शिव को जो कुछ भी प्रदत्त हुआ है, आज मैंने आपकी कृपा से ही यह व्रत पूर्ण किया है; हे दयाशील, मुझ पर प्रसन्न हों, और अपने निवास को जाएँ; इसमें कोई संदेह नहीं कि केवल आपके दर्शन मात्र से मैं पवित्र हो चुका हूँ।’ व्रती को चाहिए कि वह शिव भक्तों को भोजन दे, उन्हें वस्त्र, छत्र आदि दे- ‘हे देवाधिदेव, सर्वपदार्थाधिपति, आप लोगों पर अनुग्रह करते हैं, मैंने जो कुछ श्रद्धा से दिया है उससे आप प्रसन्न हों।’ इस प्रकार क्षमा मांग लेने पर व्रती को संकल्प करके 12 मासों की चतुर्दशी को जागरण करना चाहिए। व्यक्ति यह व्रत करके 12 ब्राह्मणों को खिलाकर तथा दीपदान करके स्वर्ग प्राप्त कर सकता है।

तिथितत्त्व में कुछ मनोरंजक विस्तार पाया जाता है। लिंग स्नान रात्रि के प्रथम प्रहर में दूध से, दूसरे में दही से, तीसरे में घृत से, चौथे में मधु से कराना चाहिए। चारों प्रहरों के मंत्र ये हैं- ‘ह्रीं ईशानाय नम:’, ह्रीं अधोराय नम:’, ‘ह्रीं वामदेवाय नम:’ एवं ‘ह्रीं सद्योजाताय नम:’। चारों प्रहरों में अर्ध्य के समय के मंत्र भी विभिन्न हैं। ऐसा भी प्रतिपादित है कि प्रथम प्रहर में गान एवं नृत्य होना चाहिए।

वर्षक्रियाकौमुदी में आया है कि दूसरे, तीसरे एवं चौथे प्रहर में व्रती को पूजा, अर्ध्य, जप एवं (शिव संबंधी) कथा श्रवण करना चाहिए, स्तोत्रपाठ करना चाहिए एवं लेटकर प्रणाम करना चाहिए; प्रात:काल व्रती को अर्ध्यजल के साथ क्षमा मांगनी चाहिए। यदि माघ कृष्ण चतुर्दशी रविवार या मंगलवार को पड़े तो वह व्रत के लिए उत्तम होती है

24, 14 या 12 वर्षों तक शिवरात्रि व्रत करने वाले को अवधि के उपरान्त उद्यापन करना पड़ता है। इस विषय में पुरुषार्थचिंतामणि  एवं व्रतराज आदि ग्रंथों में अति विस्तार के साथ वर्णन है।

किसी भी शिवरात्रि के पारण के विषय में जितने वचन हैं, वे विवाद ग्रस्त हैं। ‘स्कन्द’ के दो वचन ये हैं- ‘जब कृष्णाष्टमी, स्कन्दषष्ठी एवं शिवरात्रि पूर्व एवं पश्चात् की तिथियों से संयुक्त की जाती है तो पूर्व वाली तिथि प्रतिपादित कृत्य के लिए मान्य होती है और पारण प्रतिपादित तिथि के अन्त में किया जाना चाहिए; चतुर्दशी को उपवास करके और उसी तिथि को वही व्यक्ति कर सकता है, जिसने लाखों अच्छे कर्म किये हों।’ धर्मसिंधु का निष्कर्ष यों हैं-

‘यदि चतुर्दशी रात्रि के तीन प्रहरों के पूर्व ही समाप्त हो जाये तो पारण तिथि के अन्त में होना चाहिए; यदि वह तीन प्रहरों से आगे चली जाये तो उसके बीच में ही सूर्यादय के समय पारण करना चाहिए, ऐसा माधव आदि का मत है।’ निर्णयसिंधु का मत यह है कि यदि चतुर्दशी तिथि रात्रि के तीन प्रहरों के पूर्व समाप्त हो जाये तो पारण चतुर्दशी के बीच में ही होना चाहिए न कि उसके अन्त में।

आजकल धर्मसिंधु में उल्लिखित विधि का पालन कदाचित ही कोई करता हो। उपवास किया जाता है, शिव की पूजा होती है और लोग शिव की कथाएँ सुनती हैं। सामान्य जन (कहीं-कहीं) ताम्रफल (बादाम), कमल पुष्प दल, अफीम के बीज, धतूरे आदि से युक्त या केवल भाँग का सेवन करते हैं। बहुत से शिव मन्दिरों में मूर्ति पर लगातार जलधारा से अभिषेक किया जाता है।

ऐतरेय ब्राह्मण में प्रजापति के उस पाप का उल्लेख है, जो उन्होंने अपनी पुत्री के साथ किया था। वे मृग बन गये। देवों ने अपने भयंकर रूपों से रुद्र का निर्माण किया और उनसे मृग को फाड़ डालने को कहा। जब रुद्र ने मृग को विद्ध कर दिया तो वह (मृग) आकाश में चला गया। लोग इसे मृग (मृगशीर्ष) कहते हैं। रुद्र मृगव्याध हो गये और (प्रजापति की) कन्या रोहिणी बन गयी और तीर तीन धारा वाले तारों के समान बन गया।

लिंगपुराण में एक निषाद की कथा है। निषाद ने एक मृग, उसकी पत्नी और उनके बच्चों को मारने के क्रम में शिवरात्रि व्रत के सभी कृत्य अज्ञात रूप से कर डाले। वह एवं मृग के कुटुम्ब के लोग अंत में व्याध के तारे के साथ मृगशीर्ष नक्षत्र बन गये।